रात के धुन्धलके में खामोश एक आवाज़ सी हो,
क्यूँ आजकल थोड़ी नाराज़ सी हो?

बेबस से मेरे लफ़्ज़ों पे साज़ सी हो,
पिघलते से मोम पर रोशनी का आगाज़ सी हो.
क्यूँ आजकल थोड़ी नाराज़ सी हो?

बयाँ करती तेरी दिलकशी का, उस आहट की परवाज़ सी हो,
जलते उन दियों की दीवानगी का राज़ सी हो,
चाँद भी थोड़ा परेशान है कल से,

बोलो ना,

क्यूँ उससे नाराज़ सी हो?

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