मंज़िलों की मदहोशी में ये खबर ना हुई,
वो रास्ता ही था जो मुक़ाम सा था,

आज फिर इक शिकन ने परेशान सा किया,
ना देख पाए वो, जो सर झुका सा था.

उस ख़त को जलाने की रुत सी आई,
पर जाने क्यूँ ये दिल जला सा था.

रोज़ ही तेरी नज़रों से रूबरू हुआ करते थे,
आज देखा, उनमें एक मकान सा था.

कहते रह गए हम वो क़लाम हर मुमकिन ज़बान में,
जो खामोशी ने कहा, वो बयाँ सा था.

मंज़िलों की मदहोशी में ये ख़बर ना हुई,
वो रास्ता ही था जो मुक़ाम सा था.

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